विरोध दरकिनार:भूमि अधिग्रहण पर तीसरी बार आएगा अध्यादेश

नई दिल्ली,३०/५ः  केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में शनिवार को भूमि अधिग्रहण पर तीसरी बार अध्यादेश लाने का फैसला किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निवास 7 आरसीआर में पीएम मोदी की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि मौजूदा अध्यादेश की अवधि 4 जून को खत्म होने जा रही है, उसके पहले ही सरकार को नया अध्यादेश लाना होगा। इससे पहले सरकार मार्च में भूमि अधिग्रहण पर अध्यादेश लाई थी। दरअसल कांग्रेस समेत सभी विपक्षी पार्टियां इस बिल का किसान विरोधी बताते हुए विरोध कर रही हैं।विपक्षी पार्टियों का कहना है कि यह बिल किसानों के खिलाफ और उद्योगपतियों के लिए मददगार है। यही नहीं, केंद्र में भाजपा की सहयोगी शिवसेना ने भी इस बिल पर सवाल उठाए हैं। राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है। ऎसे में इस बिल को पास करवाना टेढी खीर बन गया है। मार्च में भारी विरोध के बीच लाए गए भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को कानून में बदलने की केंद्र सरकार ने पूरी कोशिश की, लेकिन विपक्ष के विरोध के चलते यह संभव नहीं हो सका। फिलहाल यह बिल संसद की संयुक्त समिति के पास है, जो इस पर विचार कर रही है। रह्वाजनीतिक दलों के अलावा किसान नेताओं ने भी नए भूमि अधिग्रहण बिल का विरोध किया है, लेकिन सरकार अपने फैसले पर अडी हुई है।

शुक्रवार को जमीन अधिग्रहण विधेयक पर संसद की संयुक्त समिति की पहली बैठक में कई विपक्षी सदस्यों ने सरकार द्वारा 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के प्रावधानों को बदलने के औचित्य को लेकर सवाल उठाए। विधेयक के समर्थन में सरकार के तकोंü पर असंतोष जताते हुए सदस्यों ने इस मुद्दे पर जवाब की मांग की। भाजपा सदस्य एसएस अहलूवालिया की अध्यक्षता में हुई बैठक में ग्रामीण विकास मंत्रालय और कानून मंत्रालय के विधायी विभाग ने सदस्यों के समक्ष “भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनस्र्थापन में उचित मुआवजा के अधिकार और पारदर्शिता से संबंधित अधिनियम, 2013” में किए गए संशोधनों पर प्रेंजेटशन दिया।

सूत्रों ने कहा कि दोनों मंत्रालयों के अधिकारियों ने संशोधनों की व्याख्या की तो कांग्रेस, बीजद, तृणमूल कांग्रेस और लेफ्ट समेत विपक्षी दलों के सदस्यों ने भूमि अधिग्रहण करते समय सहमति के प्रावधान को हटाने और सामाजिक प्रभाव आकलन की जरूरत को समाप्त करने के औचित्य पर सवाल पूछे। अध्यादेश के माध्यम से करीब छह महीने पहले संशोधन किए गए थे, जिनमें सहमति के प्रावधान को हटा दिया गया था। प्रेंजेटेशन के दौरान कुछ सदस्यों ने औद्योगिक कॉरिडोरों के लिए भूमि अधिग्रहण पर और अधिक स्पष्टता चाही। कई सदस्यों ने मांग की कि यह मुद्दा जटिल है इसलिए वे संशोधनों के औचित्य पर मंत्रालयों का समग्र जवाब चाहेंगे। सूत्रों के अनुसार ग्रामीण विकास और विधि समेत कई मंत्रालय समिति को अगले महीने की शुरूआत में संयुक्त उत्तर दे सकते हैं। समिति मॉनसून सत्र के पहले दिन रिपोर्ट पेश कर सके, इस लिहाज से हर हफ्ते में दो बार बैठक होगी। मॉनसून सत्र सामान्यतया जुलाई के मध्य में शुरू होता है।

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