एक साल:मोदी को काम पर नाज मगर घर के ही ढूंढने लगे खोट

नई दिल्ली,१९/५ः  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के एक साल पूरा होते-होते अब सरकार के अंदर से भी छिद्रान्वेषण शुरू हो गया है। गरीबों के कल्याण की स्कीमों के फंड में कटौती को लेकर पीएम मोदी के कैबिनेट के अंदर से ही विरोध के स्वर उठने शुरू हो गये हैं। और तो और आरएसएस ने भी एक साल के काम पर ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया है।संघ सूत्रों के हवाले से खबर है कि संघ मोदी सरकार के एक साल के कार्यकाल के अपने मूल्यांकन से भाजपा को जल्द ही अवगत क राएगा। मोदी ने भारत की कल्याणकारी स्कीमों को प्राथमिकता देने की परंपरा को तोडते हुए केंद्रीय सामाजिक कल्याण की स्कीमों और सब्सिडी पर खर्च होने वाले फंड में कटौती की और इसे इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च कर दिया। सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर पर यह सोचकर निवेश किया कि इससे आर्थिक विकास की रफ्तार तेज होगी। सरकार का कहना है कि कल्याणकारी स्कीमों में जो कटौती हुई है उसकी भरपाई के लिए राज्य सरकारों को टैक्स रेवेन्यू में बडा हिस्सा दिया जायेगा।

इस मुआवजे को राज्य सरकारें अपनी मर्जी से खर्च कर सकेंगी। लेकिन, राज्य प्रमुखों, सरकारी अधिकारियों और कैबिनेट मंत्री ने चेताया है कि कल्याणकारी स्कीमों में कटौती से देश के सबसे संवेदनशील समूह का भविष्य खतरे में पड जायेगा। मोदी कैबिनेट में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने कहा है कि मोदी की इस पॉलिसी की मार देश के करीब 3 करोड गरीब लोगों पर पडेगी। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक मेनका गांधी ने 27 अप्रैल को वित्त मंत्री अरूण जेटली को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने लिखा,इसके नतीजे में ऎसी स्थिति पैदा होगी जहां बच्चों के कुपोषण, गर्भवती और दूध पिलाने वाली मांओं के लिए पोषण से संबंधित अहम कार्यक्रम पर ध्यान केंद्रित करना असंभव होगा।

उन्होंने लिखा, मुझे लगता है कि इसके राजनीतिक परिणाम बहुत ही बुरे हो सकते हैं। यह चेतावनी कम से कम तीन गरीब राज्यों ने निजी तौर पर दी है। अपने पूर्णकालिक बजट में जिसे 7 मई को संसद ने मंजूरी दी मोदी ने एक स्कीम के फंड में कटौती करके आधा कर दिया है। इस स्कीम के तहत लाखों गरीब बच्चों को मुफ्त खाना उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने की एक योजना के फंड में बहुत ही भारी कटौती कर दी। गरीबी से त्रस्त राज्य ओडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने पीएम मोदी को 29 अप्रैल को लिखे अपने एक पत्र में विरोध जताया था।

उन्होंने लिखा था कि मोदी सरकार की नई पॉलिसी के कारण ओडीशा पर करीब 3350 लाख डॉलर का बोझ पड गया है जिसका भार राज्य संभालने की स्थिति में नहीं है। उन्होंने लिखा, हमारे इस नुकसान की भरपाई उस 10 फीसदी टैक्स रेवेन्यू से नहीं होगी जिसका सरकार ने वादा किया है। इसका देश के कुछ अधिक संवेदनशील और पिछडे क्षेत्रों पर बहुत ही गंभीर सामाजिक-आर्थिक परिणाम देखने को मिलेगा। स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारियों ने एक संसदीय कमिटी के समक्ष अपनी चिंता साझा की थी। उन लोगों ने संसदीय कमिटी से बताया था कि बजट का मुफ्त दवा और क्लिनिकों को मजबूत करने की योजना पर बहुत ही बुरा असर पडेगा।

दूसरी ओर सरकार ने सडकों और पुलों के लिए राशि दोगुना कर दी जो शिक्षा के लिए देय राशि से अधिक है। बच्चों के लिए आहार और पानी उपलब्ध कराने की योजना कितनी अहम है उसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि भारत में गरीब लोगों की बहुत ही दयनीय स्थिति है। विश्व के हर दस कुपोषित बच्चों में से चार बच्चा भारत का होता है। यह आंक़डा अफ्रीका के देशों से भी ज्यादा है। देश के अस्पताल ग्रामीण इलाकों के बच्चों से भरे हुये हैं जो घटिया सफाई और स्वास्थ्य व्यवस्था के कारण कुपोषण का शिकार हैं। ये सारे हालात सरकार को सोचने को मजबूर करेंगे।

Comments

comments